Wednesday, April 11, 2012

मन की हार मैंने खिड़की से झांका, तो दूर किसी छत पर किसी महिला को कपड़े पसारते देखा। सुन्दर थी, जवान थी, तरोताजा और उमंगों से भरपूर थी, हवा के साथ बहक गयी मेरी भावनाएं पलक झपकते ही उस तक पहुंच गया मेरा ही अपना मन। उसके हर अंग प्रत्यंग को छुआ, टटोला, तौला। जो जो करने की मनाही थी, मन ने निर्लज्ज होकर सब कुछ किया। मन खुश हुआ तो मैं भी खुश हुआ मन की खुशी में ही मेरी खुशी जो थी। फिर अचानक वह महिला छत से उतर गयी मन को भी लौटना पड़ा मुझ तक पर वह लौटा अमावस रात के घनघोर अंधेरे जैसी उदासी के साथ। मुझे अचरज हुआ, अवाक् उसे निहारता रहा मन मुहं छिपाये मेरी छाती में धंसने को आतुर। मैंने फूहड़ों जैसी भाषा का इस्तेमाल किया, साले, खूब तो मजे लिये फिर मुहं ऐसा क्यों बना लिया? मन ने बेजान सी आवाज में कहा, मैंने उसका शरीर ही छुआ..तुम तो जानते ही हो कुत्ते, बिल्ली, सियार तक भी कभी भी किसी का भी शरीर छू सकता है...ट्रेनों में, बसों में, सड़कों पर, आफिसों में, कलकारखानों में, खेतों में और खलिहानों में। मैंने उसके मन को छूने की इच्छा की परंतु मन तो दुर्भेद्य लोहे के किले में बंद रहता है...सर पटक पटक कर हार गया मन होकर भी उसके मन के किले को फतह नहीं कर सका...। मन नहीं जीता तो खाक फिर क्या जीता। मन की आंखों से बेबसी के आंसू टपकते जा रहे थे टपकते ही जा रहे थे। -सुभाष विश्वास

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