Thursday, December 18, 2014
कब हम धर्म के मोहजाल से मुक्त होंगे?
यह वैज्ञानिक कटु सत्य है कि मानव (Homo Sapiens अर्थात अच्छा मानव) प्रजाति का उदय दक्षिण अफ्रीका के जंगलों में हुआ था। एक शिंपाजी की दो पुत्रियां थीं। एक पुत्री समस्त शिंपाजी प्रजातियों की जननी थी तो दूसरी पुत्री मानव की ओल्ड ग्रैंड मदर थी। जब होमो सेपियन्स ने अन्य समस्त प्राणियों का प्रभुत्व समाप्त कर इस धरती पर अपना श्रेष्ठत्व कायम किया, तब न तो समाज था, न धर्म था, न भाषा थी और न ही गांव, देश, राष्ट्र और तमाम सामाजिक रिश्ते नाते थे। बौद्धिक क्रांति के बाद जब कृषि क्रांति हुई, उसके बाद ही समाज को संगठित करने, आपसी संघर्ष, विवाद और अनुशासन बनाये रखने के लिए समस्त प्रकार के नियम कानून, रीति-नीति, संस्कार, विविध संगठन इत्यादि की नींव पड़ी। सभ्यता का विकास हुआ। विज्ञान, कला, इतिहास, गायन-वादन, ज्योतिष्कविज्ञान इत्यादि विविध विधाओं में मनुष्य पारंगत होते गये। विविध प्रकार के समाज बने। देश का गठन हुआ। संप्रभुता, पूंजीवाद, साम्यवाद, समाजवाद, भोगवाद, त्यागवाद, ज्ञान मार्ग, भक्ति मार्ग इत्यादि की अवधारणाएं पनपने लगीं। उस समय इन सब चीजों की आवश्यकता भी थी। परंतु आज वैज्ञानिक क्रांति की बदौलत मानव सभ्यता लंबी छलांग लगा चुकी है। मनुष्य सिर्फ धरती में होने वाली घटनाओं को लेकर ही निश्चिंत नहीं हैं। हम चांद पर विजय प्राप्त कर चुके हैं। हम मंगल ग्रह पर अपना यान उतार चुके हैं। हमारे हाथ में एक से एक प्रकार का मोबाइल फोन है। इंटरनेट है। सेकेंडों में ही हम अपने ईष्ट-मित्रों से सम्पर्क करते हैं, परिवार से जुड़ जाते हैं। बात करते हैं। तस्वीर देखते हैं। बुलेट ट्रेन बन चुकी है। सुपर सोनिक हवाई जहाज हमें चंद घंटों में ही एक महादेश से दूसरे महादेश में पहुंचा देता है। पनडुब्बी है। हमारे पास परमाणु हथियार है, जो धरती को पल भर में भस्म करने में सक्षम है। गर्मी में हमारे पास वातानुकूलन की सुविधाएं हैं। कार में एसी है, कमरे में एसी है। सुख-सुविधाओं से संपन्न हो चुके हैं हम सब। हमारे पास क्या नहीं है? संपूर्ण विश्व एक छोटा सा गांव बन चुका है। इतना सब होने के बावजूद इस गांव में क्या हम लोग सुख चैन से रह पाते हैं? आप देखेंगे कि चारों तरफ मारकाट मची हुई है। हिंसा में निर्दोष लोगों की मृत्यु हो रही है। हम सब एक दूसरे के खून के प्यासे हो चुके हैं। किसी समय दुनिया में राजतंत्र पर धर्म का प्रभाव व्यापक था। पुरोहित, पादरी इत्यादि की सलाह लिये बिना राजा कोई काम नहीं करता था। आज भी वही सब हो रहा है। स्वरूप जरा सा बदल गया है। आज संत आसाराम, संत रामपाल की खबरें आ रही हैं। न जाने और कितने सारे बाबा होंगे।
भारत में खासकर हिन्दू धर्म में संतों की भरमार हो गयी है। इतने पंथ और इतने संत अन्य देशों में एवं अन्य धर्मों में हैं क्या? मैंने नहीं सुना है। धर्म के ये सारे ठेकेदार क्या चमत्कार करेंगे, भगवान ही जाने। इतिहास में इस बात का कहीं भी उल्लेख नहीं है कि नानकजी, तुकारामजी, संत ज्ञानेश्वरजी, कबीरदासजी, तुलसीदासजी, चैतन्यमहाप्रभु, मीराबाई, सूरदास, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, जैसे संत धन संपत्ति लेकर प्रवचन देते थे अथवा भजन करते थे। उस समय के संत और गुरु तड़क भड़क से दूर रहकर प्रभु का नाम लेते थे। शिवाजी के गुरु संत रामदास ने कभी भी राजमहल का सुख नहीं लिया। लेकिन आजकल संत प्रवचन करने, भजन करने के लिए भारी भरकम धन लेते हैं। उनका प्रवचन सुनने के लिए पहले से ही हजारों रुपये की फीस जमा करनी पड़ती है। वे पांच सितारा होटलों के एसी रूम में ठहरते हैं। दिव्य भोग लगाते हैं। महलों में निवास करते हैं। सुन्दरियां आगे पीछे घूमती रहती हैं। किसी भी गुरु को नहीं देखा जिनके साथ महिला शिष्या न हो। शायद अपवाद कुछ हो सकते हैं। ढोंगी संतों और गुरुओं के बहकावे में हैवान बनते जा रहे हैं। संस्कृत के कुछ श्लोक रटकर ऐरा गैरा नत्थू खैरा संत बनकर पैसा कमा रहे हैं। हमारे देश को कौन बचायेगा? किसी धर्म के संत लोगों को ठग रहे हैं, तो किसी अन्य धर्म के संत लोगों को हिंसा तथा नफरत की आग में झोंक रहे हैं....दुनिया भौतिक रूप से प्रगति कर रही है, परंतु हम हैं कि मानसिक रूप से पत्थर युग की तरफ लौट रहे हैं....। हम जंगली सभ्यता के पुरोधा बनते जा रहे हैं। यथार्थ में मानवता की बात, मानवसेवा, देश सेवा, समाज सेवा की बात कोई नहीं कर रहा है। किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना मेरा उद्देश्य नहीं है। हमें निष्पक्ष होकर वैश्विक मंगल और मानवता के हित में चिंतन करते हुए तदनुसार निर्णय लेना चाहिए।
हम आजकल जाति, धर्म, रंग, समुदाय में बंट चुके हैं। मेरा एक ही सवाल है, मेरे अथवा आपके अस्तित्व के लिए दो लोगों की सक्रिय भूमिका थी। अर्थात दो लोगों के सहयोग से मेरा या आपका जन्म हुआ। उन दो लोगों के जन्म के लिए चार लोग जिम्मेदार थे। उन चार लोगों के जन्म लोगों के लिए आठ लोगों की भूमिका थी। उन आठ के लिए सोलह, सोलह के लिए 32, 32 के लिए 64.....कृपया मात्र पचास पीढ़ी पीछे जाइये, और पता लगायें कि मेरे या आपके वर्तमान अस्तित्व के लिए कितने लोगों का नेपथ्य में योगदान रहा है। उसके बाद पड़ोसी, विधर्मी, परधर्मी या विदेशी का कत्ल करने के लिए क्या आप हथियार उठा सकेंगे?
सुभाष चन्द्र विश्वास
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