Friday, December 26, 2014
महिलाएं बनाम खाप पंचायतें और मनु
हाल ही राजस्थान के बाड़मेर से एक खबर आयी है। जिले के धोरीमन्ना थाना क्षेत्र के लुहारवा गांव में खाप पंचायत ने एक विवाहिता की नाक काटने तथा पीहर वालों का हुक्का पानी बंद करने का तालीबानी फरमान जारी किया है। पीड़ित महिला का अपराध इतना था कि उसने अपने ससुर के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज कराया था। इस आरोप में ससुर जेल गया लेकिन जमानत पर रिहा होने के बाद उसने समाज के ठेकेदारों से मिलकर खाप पंचायत बुलाई। इसके बाद पीड़ित महिला को बदचलन करार देते हुए उसकी नाक काटने तथा पीहर वालों का हुक्का पानी बंद करने का फरमान जारी करा दिया।
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर की खाप पंचायत ने भी कुछ दिनों पहले एक विवादित फैसला सुनाया है जिसमें लड़कियों को व्हाट्सएप, फेसबुक, इंटरनेट, मोबाइल से दूर रहने और जींस नहीं पहनने का फरमान सुनाया है। मुजफ्फरनगर के शाहपुर थाना के शोरम गांव में 36 बिरादियों के खाप मुखियाओं ने पंचायत की। पंचायत के फरमान के तहत खाप मुखियाओं ने युवतियों के लिए व्हाट्सएप, फेसबुक, इंटरनेट, मोबाइल के इस्तेमाल और जींस पहनने पर रोक लगाने का फरमान सुना दिया। लड़कियों को इन सबसे दूर रहने की हिदायत दी गई है। खाप पंचायत ने कहा कि 18 साल के बाद लड़के या लड़की को मोबाइल दिया जाना चाहिए। इससे पहले वो फेसबुक देखते हैं, व्हाट्सएप देखते हैं, गंदी फिल्में देखते है। इसका गलत इस्तेमाल होता है।
इसके पहले राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में मानवता को शर्मसार कर देने वाले एक मामले में 80 साल की एक वृद्धा को खाप पंचायत के आदेश पर निर्वस्त्र करने के बाद मुंह काला कर गधे पर घुमाया गया। जिले के करेड़ा तहसील के रायपुर थाना क्षैत्र में इस महिला की 30 बीघा जमीन हड़पने की नीयत से कुछ दबंगों ने उसे डायन करार दिया और कहा कि वह गांववालों के बच्चों को खा जाएगी। बाद में महिला को गधे पर बिठाकर गांव में घुमाया गया और रात भर यातनाएं देते हुए उसे पशुओं के बांधने की जगह पर खूंटे से बांध दिया गया। पीड़ित महिला ने बताया कि उसके पति की मौत करीब 37 वर्ष पहले हो गई थी और उसकी कोई औलाद नहीं है। इसके चलते कुछ गांव वाले उसकी 30 बीघा कीमती जमीन हड़पने की नीयत से आए दिन परेशान करते रहते थे। जब महिला ने इसका विरोध करना शुरू किया, तो लोग उसे डायन बताने लगे। यही नहीं, पंचायत ने भी महिला को गांव से बाहर निकाल देने की धमकी दी। पंचायत ने यह भी फैसला सुनाया कि अगर किसी ने महिला से बातचीत की, तो उसे एक लाख रुपये का जुर्माना भरना होगा। इसके बाद भी महिला ने गांव नहीं छोड़ा, तो कुछ दबंगों ने मुंह काला करके उसे निर्वस्त्र कर दिया और फिर गधे पर बिठाकर गांव में घुमाया।
खाप या सर्वखाप एक सामाजिक प्रशासन की प्रणाली है जो उत्तर पश्चिम भारत जैसे हरियाणा, राजस्थान, पंजाब एवं उत्तर प्रदेश में प्राचीन काल से ही प्रचलित है। इसका मुख्य उद्देश्य समाज में सामाजिक व्यवस्थाओं को बनाये रखने के लिए मनमर्जी से काम करने वालों अथवा असामाजिक कार्य करने वालों को नियंत्रित करना है। उनका मानना है कि यदि ऐसा न हो तो स्थापित मान्यताएं, विश्वास, परम्पराएं और मर्यादाएं ख़त्म हो जायेंगी और जंगल राज स्थापित हो जायेगा। जाट समाज में यह न्याय व्यवस्था आज भी प्रचलन में है। इसी आधार पर बाद में ग्राम पंचायत का जन्म हुआ। खाप दो शब्दों से मिलकर बना है। ये शब्द हैं 'ख' और 'आप'। ख का अर्थ है आकाश और आप का अर्थ है जल। अर्थात ऐसा संगठन जो आकाश की तरह सर्वोपरि हो और पानी की तरह स्वच्छ, निर्मल और सब के लिए उपलब्ध अर्थात न्यायकारी हो।
समय बदलता गया। कई कई क्रांतिकारी परिवर्तन हुए, परंतु खाप पंचायत अपनी सड़ीगली मान्यताओं को अभी भी ढोती जा रही हैं। हम दूसरे धर्म के लोगों को उलाहना देते हैं कि वे वर्षों पुराने धार्मिक कानूनों के मुताबिक चलते हैं, परंतु हम अपने भीतर कभी झांकने का दुस्साहस नहीं करते हैं। ये खाप पंचायतें सम्मान के लिए हत्या तक को भी जायज ठहराती हैं। कभी कहती हैं कि सगोत्र में शादियां नहीं होनी चाहिए। कभी फिर प्यार मोहब्बत करने वालों को कड़ी सजा देती हैं। एक से एक विवादास्पद और दकियानूसी फरमान जारी कर खाप पंचायतें हमेशा चर्चा में रहती हैं। हमारा कानून इनका कुछ नहीं कर सकता है। यहां तक सर्वोच्च न्यायालय ने भी इनके फैसलों को गलत बताया है, फिर भी इन पर अंकुश लगाने में सरकार असफल रही है। इन खाप पंचायतों का मुख्य निशाना महिलाएं ही होती हैं। इनकी नजरों में लड़कियां मां-बाप, गांव और खाप की निजी संपत्ति है। वैसे इनकी सोच में कोई गलती भी नहीं है। क्योंकि हमारे प्राचीन धार्मिक नेताओं ने भी महिलाओं को ऐसे ही प्रस्तुत किया है। उसी रूढ़िवादी विचारों का मात्र निर्वहन किया जा रहा है। संपूर्ण हिन्दू समाज में भी नारियों की स्थिति कुछ सुखद नहीं है। देवदासी प्रथा, नगरवधू प्रथा, सती प्रथा, परदा प्रथा इत्यादि इसके ज्वलंत उदाहरण है।
इस प्रसंग में कुछ लोग शान से यह श्लोक सुनाते हैं-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:।
(जिस कुल में नारियों की पूजा, अर्थात सत्कार होता हैं, उस कुल में दिव्यगुण, दिव्य भोग और उत्तम संतान होते हैं और जिस कुल में स्त्रियों की पूजा नहीं होती, वहां उनकी सब क्रिया निष्फल हैं।)
इसे सुनकर ऐसा लगता है कि हमारे भारतीय समाज, विशेष रूप से हिन्दू समाज में महिलाओं का बहुत मान सम्मान होता था। कई विद्वानों और गुणीजनों का प्रचण्ड दावा है कि प्राचीन काल में वैदिक समाज में महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त था। वे लोग गार्गी, मैत्रेयी और विद्याधरी का नाम लेते हैं। ऋग्र्वेद में ब्रम्हज्ञानी पुरुषों के साथ-साथ ब्रम्हवादिनी महिलाओं का भी नाम आता है। इनमें विश्ववारा, लोपामुद्रा, घोषा, इन्द्राणी, देवयानी आदि प्रमुख महिलाएं हैं। उन्हें श्रद्धा के साथ नमन करते हैं और निर्णय पर पहुंचते हैं कि मध्य युग के बाद और खासकर इस्लाम शासन के बाद से ही महिलाओं की स्थिति में गिरावट आयी है। चूंकि मैं प्राचीन काल का नहीं, बल्कि इस युग का हूं। मुझे प्राचीन काल में महिलाओं की दशा के बारे में इतना ही पता चला कि उपरोक्त दो चार नामों को छोड़कर कोई चमत्कारी महिलाओं का उल्लेख नहीं है। वर्तमान युग में सरोजिनी नायडू, विजय लक्ष्मी पंडित, प्रथम महिला प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी, किरण बेदी, मदर टेरेसा, अरुणा आसफ अली, आशापूर्णा देवी, उज्ज्वला पाटिल, रीता फारिया, बछेन्द्री पाल, संतोष यादव, चंदा कोचर, अरुन्धती भट्टाचार्य, महाश्वेता देवी, महादेवी वर्मा, सानिया मिर्जा, सायना नेहवाल जैसे सैकड़ों नाम मिल जायेंगे, जिन्होंने विविध क्षेत्रों में पूरी दुनिया में अपने को स्थापित किया है। इतने सारे नाम मिल जाने के बाद भी क्या हम दावे के साथ कह सकते हैं कि भारत में महिलाओं की स्थिति सुखद है? वे सम्मान और स्वतंत्रता के साथ जीवन जी रही हैं? जब वर्तमान युग में लोकतंत्र की स्थापना, संविधान में अधिकारों की रक्षा, पुलिस प्रशासन की चौकसी, संचार माध्यमों की प्रगति, शिक्षा का प्रसार, परिवहन की सुविधा, संवाद कायम करने के इतने सारे साधन होने के बावजूद महिलाओं की कुल मिलाकर स्थिति दयनीय ही है, तो हम किस आधार पर चार-पांच महिलाओं का नाम गिनाकर दावा करते हैं कि पुराने जमाने में महिलाओं को पुरुषों जैसा सम्मान मिलता था।
मनुस्मृति में कहा गया है-
स्वभाव एष नारीणां नराणामिहदूषणम .
अतोर्थान्न प्रमाद्यन्ति, प्रमदासु विपश्चित:
अविद्वामसमलं लोके,विद्वामसमापि वा पुनः
प्रमदा द्युतपथं नेतुं काम क्रोध वाशानुगम
मात्रस्वस्त्रदुहित्रा वा न विविक्तसनो भवेत्
बलवान इन्द्रिय ग्रामो विध्दांसमपि कर्षति !
(अर्थात: पुरुषों को अपने जाल में फंसा लेना तो स्त्रियों का स्वभाव ही है! इसलिए समझदार लोग स्त्रियों के साथ होने पर चौकन्ने रहते हैं, क्योंकि पुरुषों के काम क्रोध के वश में हो जाने की स्वाभाविक दुर्बलता को भड़काकर स्त्रियां, मूर्ख ही नहीं, बल्कि विद्वान पुरुषों तक को विचलित कर देती हैं! पुरुष को अपनी माता, बहन तथा पुत्री के साथ भी एकांत में नहीं रहना चाहिए, क्योंकि इन्द्रियों का आकर्षण बहुत तीव्र होता है और विद्वान भी इससे नहीं बच पाते।)
महिलाओं के प्रति मनु का विचार-
नैता रूपं परीक्षन्ते नासां वयसि संस्थिति:
सुरूपं व विरूपं वा,पुत्रनित्येव भुजन्ते
पौंश्चल्याच्चलचित्ताच्च, नैस्नेह्याच्च स्वभावतः
रक्षिता यत्नतोअपीह भर्तुष्वेता विकुवते
एवं स्वभावं ज्ञात्वाअअसां प्रजापति निसर्गजम
परमं यत्नमातिष्ठेत्पुरुषों रक्षणं प्रति
श्य्यासनमलंकारं कामं क्रोधं अनार्जवम
द्रोहभावं कुचर्या च स्त्रीभ्यो मनुरकल्पयत !
(अर्थात: पुरुषों में स्त्रियां न तो रूप का विचार करती हैं, न उसकी आयु की परवाह करती है! सुन्दर हो अथवा बदसूरत, जैसा भी पुरुष मिल जाये उसी के साथ भोग-रत हो जाती हैं। सदा पुरुष-संग की इच्छा रखने वाली ,चंचल-चित्त तथा स्वभाव से निष्ठुर होने के कारण, कितने भी यत्न से क्यों न रखी जाये, स्त्रियां पतियों के प्रति निष्ठावान नहीं रह जाती हैं। ये दुर्गुण स्त्रियों में सृष्टि के आदि काल से ही विद्यमान है, अत: पुरुष को बड़े यत्न से रक्षा करनी चाहिए। सृष्टिकर्ता ने नारी की रचना करते समय ही उसमे अपनी शय्या, आसन, आभूषण के प्रति मोह तथा काम, क्रोध ,बेईमानी ,द्वेष -भाव एवं चरित्रहीनता से दुर्गुण कूट-कूट कर भर दिये।) .
मनु के विचार में महिलाओं को किसी भी हालत में स्वतंत्र नहीं होने देना चाहिए-
अस्वतंत्रता: स्त्रियः कार्या: पुरुषै स्वैदिर्वानिशम
विषयेषु च सज्जन्त्य: संस्थाप्यात्मनो वशे
पिता रक्षति कौमारे भर्ता यौवने
रक्षन्ति स्थाविरे पुत्र, न स्त्री स्वातान्त्रयमर्हति
सूक्ष्मेभ्योपि प्रसंगेभ्यः स्त्रियों रक्ष्या विशेषत:
द्द्योहिर कुलयो:शोक मावहेयुररक्षिता:
इमं हि सर्ववर्णानां पश्यन्तो धर्ममुत्तमम
यतन्ते भार्या भर्तारो दुर्बला अपि
(अर्थात: पुरुषों को अपने घर की सभी महिलाओं को चौबीस घंटे नियन्त्रण में रखाना चाहिए और विषयासक्त स्त्रियों को तो विशेष रूप से वश में रखना चाहिए! बाल्य काल में स्त्रियों की रक्षा पिता करता है! यौवन काल में पति तथा वृद्धावस्था में पुत्र उसकी रक्षा करता है! इस प्रकार स्त्री कभी भी स्वतंत्रता की अधिकारिणी नहीं है! स्त्रियों के चाल ढाल में ज़रा भी विकार आने पर उसका निराकरण करना चाहिये! क्योंकि बिना परवाह किये स्वतंत्र छोड़ देने पर स्त्रियाँ दोनों कुलों (पति व पिता ) के लिए दुखदायी सिद्ध हो सकती हैं! सभी वर्णों के पुरुष इसे अपना परम धर्म समझते हैं! और दुर्बल से दुर्बल पति भी अपनी स्त्री की यत्नपूर्वक रक्षा करते हैं!)
संक्षेप में इतना ही कहा जा सकता है कि खाप पंचायतें और कुछ हद तक बंगाल में सालिशी सभाएं (ग्रामीण न्याय बैठक) सिर्फ मनुवादी संस्कृति का ही अनुपालन कर रही है। खाप पंचायत के बारे में नेट खंगालने के दौरान एक किसी सिंह बंधु ने दावा किया है कि जाट ही एकमात्र शुद्ध नस्ल है। उसने यह भी दावा किया है करगिल की लड़ाई में जब सभी रेजिमेंट फेल हो गयी तो जाट रेजिमेंट को भेजा गया और उसने पाक फौज को शिकस्त दी। उसने यह भी सवाल उठाया कि चमार रेजिमेंट, नापित रेजिमेंट या चूड़ा रेजिमेंट का गठन क्यों नहीं किया गया है। हंसी आती है। कभी हिटलर ने भी दावा किया था कि जर्मन खून ही शुद्ध और सर्वश्रेष्ठ है।
बहुत सारे हिन्दू विद्वान ऐसे विचारों की परवाह नहीं करते हैं, कहते हैं कि ये सनकी लोग हैं, इनकी बातों को छोड़ दें। ये विद्वान लम्बा चौड़ा दर्शन बघारेंगे, भाषण देंगे और जब अपनी बहू-बेटियों की बात आयेगी, जब अपने परिवार की बात आयेगी, तो कन्नी काट लेंगे, कहेंगे, भाई मजबूरी है- पिताजी, माताजी, पत्नी, भैया, चाचा, दादा-दादी, परिजनों सबका मान रखना ही होगा...। मैंने बहुत बड़े बड़े प्रतिष्ठित व्यक्तियों को देखा है जो अन्तर्जातीय विवाह का समर्थन तो करते हैं, परंतु अपने बेटे-बेटियों को सख्त हिदायत देते हैं- खबरदार, जाति के बाहर जाकर कुछ भी नहीं करना है।
महान दार्शनिक, पर्यटक तथा लेखक राहुल सांकृत्यान की पुस्तक ``वोल्गा से गंगा तक’’ में उल्लेख है कि आदिम समाज मातृसत्तात्मक हुआ करता था। नारी दल या झुंड का नेतृत्व करती थी। उसके अधीन ही पुरुष रहते थे। (अभी भी कुछ आदिवासी समुदायों में यह प्रथा कायम है।) दल नेत्री मनचाहे पुरुष से शारीरिक संपर्क बनाती थी। दल में उसके कई पति हुआ करते थे, जैसे पुत्र स्वामी, पिता स्वामी, भ्राता स्वामी इत्यादि। लेकिन जब से पितृसत्तात्मक समाज की नींव पड़ी, लगभग समूचे विश्व में ही महिलाओं की स्थिति बिगड़ती चली गयी। कुछ लोग महिलाओं को आधी दुनिया मानते हैं, पर मेरे विचार से कुछ अपवादों को छोड़कर परतंत्रता ही महिलाओं की पूरी दुनिया है। - सुभाष चन्द्र विश्वास
Tuesday, December 23, 2014
महज छह सौ रुपये के लिए आत्महत्या का प्रयास...
पिछले हफ्ते मेरे एक दोस्त ने फ्लिप कार्ट से एक जैकेट मंगाया था, जिसकी कीमत थी तीन हजार रुपये। ऐसी बात नहीं है कि उसके पास गर्म कपड़ों की कमी है। उसके पास सूट है, दो-दो पूरी बांह का स्वेटर तथा तीन-चार हाफ स्वेटर भी हैं। फिर भी उसने खर्च कर दिये तीन हजार रुपये। कुछ तो शौक पूरा करना था और कुछ लोगों को दिखाना भी था। खैर तीन हजार रुपये कोई बहुत बड़ी रकम नहीं है। हमारे देश में ऐसे हजारों लोग हैं जो करोड़ों रुपये की कार में चलते हैं। बुर्ज खलीफा में फ्लैट लिये हुए हैं। मुकेश अम्बानी का नाम तो हम सबने सुना है। दक्षिण मुम्बई में मुकेशजी का मकान लगभग 1 अरब अमरीकी डालर (लगभग 55 रुपये का एक डालर) से तैयार हुआ है। मकान के रखरखाव के लिए ही 600 कर्मचारी नियुक्त किये गये हैं। सोचिये 6 सौ कर्मचारियों का वेतन कितना हो सकता है। दुनिया का यह दूसरा सबसे महंगा आवासीय मकान है। हमारे देश के लगभग सभी बड़े शहरों में पांच सितारा होटल हैं। लाखों लोग इन होटलों में रुपये पानी की तरह बहाकर गर्व का अहसास करते हैं। एक एक फिल्म अभिनेता शाही अंदाज में जीवन बिताते हैं। एक एक अभिनेत्री की एक साड़ी की कीमत का अंदाजा हम लोग नहीं कर सकते हैं। एक एक नेता के पास इफरात में धन है। एक बार सांसद या विधायक बन जाने पर दो चार साल में ही करोड़ों अरबों रुपये की जायदाद के मालिक बन जाते हैं। इन सब बातों से यही साबित होता है कि हमारा देश गरीब नहीं है। हम लोग गरीब नहीं रह गये हैं। हम लोग कई मामलों में जैसे अंतरिक्ष अनुसंधान, मिसाइल का निर्माण तथा विकास, कला-संस्कृति तथा खाद्य उत्पादन में अन्य विकसित देशों का मुकाबला कर सकते हैं। कई लोग करते भी हैं।
आखिर मैं इतना सब कुछ क्यों कह रहा हूं? इतनी लंबी चौड़ी भूमिका बांधने की क्यों आवश्यकता आ पड़ी है?
वास्तव में आज ही एक समाचार पढ़ने को मिला। पश्चिम बंगाल के कांथी (कोंटई) शहर में एक छात्र ने कालेज की फीस के मात्र 2500 रुपये की व्यवस्था नहीं कर पाने की मजबूरी, लज्जा और दुख से आत्महत्या का प्रयास किया है। कांथी के देशप्राण कालेज के बंगला आनर्स का द्वितीय वर्ष का छात्र सौमेन गिरि धर्मदासबाड़ इलाके का एक गरीब छात्र है। वह ट्यूशन से अपनी पढाई का खर्च निकालता था। कोर्स फीस ढाई हजार रुपये थी। उसने बमुश्किल 1900 रुपये की व्यवस्था की थी। लेकिन शेष रुपये का इंतजाम वह नहीं कर सका। उसे लगा कि फीस नहीं देने से उसका पंजीकरण रद्द हो जायेगा। इसी आशंका से उसने कालेज परिसर में ही जहर खाकर आत्महत्या करने का प्रयास किया। खबरों के अनुसार उसे अस्पताल में भर्ती किया गया है और यह पोस्ट लिखने तक उसकी हालत खराब थी। अर्थात हम यह मान सकते हैं कि 6 सौ रुपये की मदद कहीं से मिल जाती तो सौमेन यह कदम नहीं उठाता। छह सौ रुपये क्या बहुत बड़ी रकम है? आजकल लगभग सभी छात्र-छात्राओं के पास हजारों रुपये के स्मार्ट फोन रहते हैं। कइयों के पास तो मैंने दो-दो, तीन-तीन मोबाइल भी देखे हैं। तो क्या कारण है कि सौमेन मात्र छह सौ रुपये के लिए मरने पर आमादा हो गया? दरअसल हमारे आपके पास मात्र छह सौ रुपये उसके लिए छह लाख से भी भारी थे। नहीं तो शौक से कोई मरता है क्या?
आठ मई 2013 की एक खबर है। मुजफ्फरनगर के अठाई गांव की एक दलित लड़की ने भी इसी तरह से आत्महत्या की कोशिश की थी, क्यों कि उसके माता-पिता उसके कालेज की फीस नहीं दे पाये थे। अनिता नाम की यह लड़की बीसीए की पढ़ाई कर रही थी। जब वह कालेज का फीस नहीं जमा कर सकी तो उसने नहर में छलांग लगाकर जान देने की कोशिश की। खैर लोगों ने उसे बचा लिया। सौमेन और अनिता के मामले में सबका साथ सबका विकास क्यों नहीं लागू हुआ। ऐसे और भी खबरें हैं, जो हमारी नजरों में पड़ती नहीं हैं या फिर हम उन पर नजर ही नहीं डालते हैं।
खासकर पश्चिम बंगाल में तथाकथित परिवर्तन ने क्या गुल खिलाया है? आमार सोनार बांगला, मां माटी मानुष ये सब नारे क्या हम लोगों को भ्रमित करने के लिए देते हैं? वोट बैंक के मद्देनजर लंबी चौड़ी हांकते हैं? इस राज्य में सारदा कांड जैसे करोड़ों अरबों रुपये के घोटाले की चर्चा चल रही है। राष्ट्र स्तर पर राष्ट्रमंडल खेलों में करोड़ों रुपये की हेराफेरी की पुष्टि हो चुकी है। टु जी घोटाला, कोयला आवंटन घोटाला....सैकड़ों घोटालों की खबरें रोज मिलती रहती हैं। अरबों-खरबों रुपये की लूट मची हुई है। हर राज्य में लगभग हर पार्टी का कोई न कोई नेता किसी न किसी घोटाला में फंसा हुआ है। भ्रष्टाचार और घोटाले की चर्चा करना शुरू कर दें तो एक पूरी किताब ही बन जायेगी।
जिस देश में अरबों का घोटाला होता है, लोगों को रुपये खर्च करने के लिए बहाने ढूंढने पड़ते हैं, जिस देश में लोग पान-बीड़ी-सिगरेट-गुटखा खाकर हर साल अरबों रुपये फूंक देते हैं, थूक देते हैं, उस देश में पढ़ाई का खर्च नहीं जुगाड़ कर पाने के लिए किसी को क्यों आत्महत्या के बारे में सोचना पड़ता है? हमारे संविधान में जीने का अधिकार है, शिक्षा का अधिकार है, चलने फिरने का अधिकार है। हमारी संसद में हमारे हितों की रक्षा करने के लिए हमारे प्रतिनिधि मौजूद हैं। फिर भी हम जी नहीं पाते हैं...या तो लाचारी में खुद मर जाते हैं या फिर कोई हमें मार देता है।
आमलासोल का नाम हम सब भूल गये होंगे। कोलकाता से महज 250 किलोमीटर दूर मिदनापुर जिले के आमलासोल में भुखमरी से कई लोगों के मरने की खबर से राज्य में हलचल मच गयी थी। कई सारे राजनीतिक नेता अचानक ही सक्रिय हो उठे थे। जलपाईगुड़ी के रायपुर चाय बगीचे में जून, 2014 में कम से कम छह लोगों की भुखमरी से मौत होने की खबर आयी थी। हालांकि राज्य सरकार ने इसका खंडन किया है। यह चाय बगीचा 2013 में बंद हो गया था और 645 कर्मचारी बेरोजगार हो चुके थे। कुछ पत्रकारों ने इस क्षेत्र का दौरा भी किया था तो उन्होंने कई लोगों को भूख से तड़पते हुए पाया था। जीत बहान मुण्डा नाम का एक व्यक्ति तो हड्डी का एक ढांचा बन चुका था। कई दिनों से उसे भोजन नहीं मिला था।
कितनी शर्मनाक बात है कि हमारे देश में अनाज एफसीआई के गोदामों में सड़ता रहता है और हमारे लोग भूख से मरते रहते हैं। इन बेसहारों के बारे में कौन सोचेगा? किसे हम इन अभागों की मौत के लिए जिम्मेदार ठहरायेंगे? सरकारी योजनाओं का लाभ इन लोगों तक क्यों नहीं पहुंच पाता है? शिक्षा का अधिकार अगर है तो फिर इन बच्चे-बच्चियों को आत्महत्या के लिए क्यों मजबूर होना पड़ता है। राष्ट्र, राज्य और समाज व्यवस्था की इस असफलता का क्या कारण है?
आज (अर्थात 23 दिसम्बर, 2014) निकले चुनाव परिणामों से तो हम खुश हैं कि भारतीय जनता पार्टी को झारखंड में सरकार बनाने का जनादेश मिल चुका है। जम्मू और कश्मीर में भी भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन किया है। चारों ओर खुशियां मनायी जा रही हैं। रात को खबर मिलती है कि असम में उग्रवादी हमलों में लगभग 40 लोगों की मौत हुई है। इसको लेकर भी राजनीति कुछ गरमा जायेगी। आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलेगा। कोलकाता में ईडी की हरकतों से एक खास पार्टी परेशान सी हो रही है। हम सब इन्हीं बातों में मस्त रहेंगे। सौमेन की खबर या तो छपेगी ही नहीं, छपेगी भी तो हम सब यूं ही नजरें डालकर अन्य तथाकथित महत्वपूर्ण खबरों पर चर्चा करने में व्यस्त हो जायेंगे। यही तो हमारा राष्ट्रीय चरित्र है।– सुभाष विश्वास
Thursday, December 18, 2014
मैं भी हूं पेशावर के पाप का भागीदार
आज पाकिस्तान के पेशावर के सैन्य स्कूल में मासूम बच्चों के नृशंस हत्याकांड के बाद मुझे अपने आप से ही घृणा होने लगी है। मैं अब मनुष्य कहलाने योग्य नहीं रह गया। मेरे हाथ पर, पैरों पर, सीने पर, मुहं पर भले ही खून नहीं लगा हो परंतु मेरा मस्तिष्क, मेरी संवेदनाएं, मेरी अनुभूतियां तरोताजा लाल खून में डूब सी गयी हैं। उन बच्चों का क्या दोष था? उन बच्चों को क्यों आतंकवाद की बलि पर चढ़ाया गया? इसका उत्तर न केवल पाकिस्तान सरकार को, आतंकवादी संगठनों को या फिर धार्मिक उन्माद को, बल्कि मेरे देश को, मेरे देशवासियों को तथा पूरे विश्व के लोगों के साथ साथ मुझे भी देना होगा। मैं इस महान मानवता का हिस्सा हूं। इसके किसी भी अंश में कोई भी चोट पहुंचती है तो इसके लिए मैं स्वयं भी कहीं न कहीं दोषी हूं। हमारी सारी मानवता इसके लिए दोषी है। रूस के बेसलन स्कूल में भी वर्ष 2004 की पहली सितंबर को इसी तरह की एक घटना हुई थी। चेचेन उग्रवादियों ने 777 बच्चों समेत 1100 लोगों को बंधक बना लिया था। इसका दुखांत 186 बच्चों समेत कम से कम 385 लोगों की मृत्यु से हुआ था।
क्या इसी दिन के लिए हजारों साल पहले हमारे पूर्वजों ने कंदमूल खाकर किसी तरह जीवन धारण करने की जन्मजात प्रवृत्ति छोड़ कर आग का आविष्कार किया था? खेती करने की शुरुआत की थी? भाषा का आविष्कार किया था? समाज और देश का गठन किया था? धर्मों की स्थापना की थी? किसलिए? हमारे पूर्वज तो चार पैरों से चलने वाले साधारण जानवर थे। उनके दांत सिंह या बाघ जैसे कठोर या तीक्ष्ण नहीं थे। उनके पंजों में नाखून इतने धारदार नहीं थे। उनमें हाथी जैसी शक्ति भी नहीं थी। फिर भी वे दुनिया में राज करने लगे। समस्त प्राणियों के भाग्यविधाता बन गये। दो पैरों से चलने वाले मानव के रूप में हमारा परिवर्तन क्या पेशावर में मासूम बच्चों का खून बहलाने के लिए हुआ था? क्या इसीलिए हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध इत्यादि धर्मों का गठन हुआ था? इतनी सारी उपासना पद्धति, पूजा पद्धति, इबादत की पद्धति आखिर किसा कारण से बनायी गयी? क्या इसीलिए मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा का निर्माण किया गया? इन मानव संतानों की रक्षा किसी ने भी नहीं की। मनुष्यों ने इनकी हत्या कर दी। न भगवान आगे आया और न ही खुदा आगे आया। प्रभु ईसा ने भी कुछ नहीं किया। मनुष्य बस हाथ मलते रह गये। यदि मान लें कि इन बच्चों की यही नियति थी, तो फिर नियति ही सब कुछ है क्या? पिछले जन्मों का कर्म फल? कुछ धर्मों में तो पुनर्जन्म की अवधारणा ही नहीं है। तो फिर? जब पिछला नहीं तो अगला क्या होगा? जीते जी कुछ नहीं मिला, मरने के बाद जन्नत मिलेगा? हो सकता है।
टीवी पर देखकर, अखबारों में पढ़कर इतना ही कहेंगे...च्च्च बहुत बुरा हुआ। या फिर कुछ लोग यह भी कहेंगे कि पाकिस्तान ने जैसा बोया वैसा ही काट रहा है। विश्व के तमाम राष्ट्र नेता शोक व्यक्त कर रहे हैं। पाकिस्तान में तीन दिनों का राष्ट्रीय शोक मनाया जा रहा है। मैं भी थोड़ा बहुत दुख व्यक्त कर, कुछ अनाप-शनाप प्रतिक्रिया व्यक्त कर चुपचाप बैठा हूं। दो शब्द लिख कर मन का भंड़ास निकाल रहा हूं। क्या इतना ही हम सबका कर्तव्य है? क्या इसके आगे हम कुछ नहीं कर सकते हैं?
कितने आश्चर्य की बात है कि दो साल पहले आज ही के दिन राजधानी दिल्ली में निर्भया कांड हुआ था। निर्भया कांड भी संपूर्ण मानवता के माथे पर कलंक है। हम पाकिस्तान की घटना पर तरह तरह की टिप्पणियां व्यक्त कर लेंगे, परंतु हमारे देश में निर्भया कांड के दोषियों को आज तक हम सजा नहीं दिला सके। हम तो महान लोकतंत्र के धारक हैं, हमारे पास कानून है, हमारे नेताओं के पास विवेक-बुद्धि-ज्ञान है। हमारा संविधान हमारी रक्षा करता है। पर हमारी मां बहनें सुरक्षित नहीं हैं। उनके साथ दुराचार होता रहता है, उनकी हत्या होती रहती है। कभी दहेज के लिए बलि चढ़ायी जाती है। प्रतिदिन बलात्कार, सामूहिक बलात्कार की खबरें मिलती रहती हैं। परंतु घोर आश्चर्य हमारा दमदार कानून काले काले कोट पहने कुछ लोगों के जेब में कैद हो जाता है। अपराधी मजे से सरकारी रोटियां तोड़ते रहते हैं। कुछ फिर मानवाधिकार संगठन हो हल्ला शुरू कर देते हैं। मानवाधिकार संगठनों का काम तो लगता है बस अपराधियों का ही साथ देना रह गया है।
जब महान लोकतंत्र में ऐसी हालत है तो पाकिस्तान (जो कि जन्म से लेकर आज तक ज्यादातर समय सैन्य शासन या तानाशाही के अधीन रहा है) जैसे अलोकतांत्रिक या अर्द्धलोकतांत्रिक राष्ट्र से हम क्यों कुछ उम्मीद रखते हैं? कुछ पाकिस्तानी नेता तो यहां तक आरोप लगा रहे हैं कि पेशावर के सैनिक स्कूल में हमला करने वालों को भारत ने आर्थिक मदद दी थी। हंसी आती है। जहां आत्ममंथन की आवश्यकता है, वहां दोष मढ़े जा रहे हैं। जहां ठोस कदम उठाये जाने की आवश्यकता है, वहां बहाना ढूंढा जा रहा है। पाकिस्तान के नेता इमरान खान ने ठीक ही कहा है कि यह घटना किसी एक अंग या संगठन या व्यक्ति की असफलता नहीं है। यह हम सबकी (पाकिस्तानी कौम की) असफलता है। मैं इसमें इतना ही संयोजन करना चाहता हूं कि यह पूरे विश्व की असफलता है। यह संपूर्ण मानव समाज की असफलता है। हम निर्दोष बच्चों की रक्षा नहीं कर सकते हैं। हाय रे मानव! तू चांद पर जा रहा है, मंगल पर जा रहा है, पर तू अपनी संतानों की रक्षा नहीं कर पाता है। मैं भी कुछ नहीं कर पा रहा हूं। धिक मुझ पर भी है! दो चार पंक्तियां लिख कर समझ लूंगा कि मैंने अपना कर्तव्य कर लिया है। बच्चों की मासूम आत्मा को शांति मिले....उनके माता-पिता को परमपिता इस दुख को सहने की क्षमता प्रदान करें, क्या इतनी ही कामना कर सकता हूं! क्या यही मेरी सच्ची श्रद्धांजलि है! इसके आगे क्या मैं कुछ कर सकता हूं? इसी बेबसी के लिए मैं स्वयं को क्षमा नहीं कर पा रहा हूं। मुझे लगता है कि मैं भी आज के इस पाप के लिए समान रूप से जिम्मेदार हूं। मुझे भी सजा मिलनी चाहिए!!
सुभाष चन्द्र विश्वास
कब हम धर्म के मोहजाल से मुक्त होंगे?
यह वैज्ञानिक कटु सत्य है कि मानव (Homo Sapiens अर्थात अच्छा मानव) प्रजाति का उदय दक्षिण अफ्रीका के जंगलों में हुआ था। एक शिंपाजी की दो पुत्रियां थीं। एक पुत्री समस्त शिंपाजी प्रजातियों की जननी थी तो दूसरी पुत्री मानव की ओल्ड ग्रैंड मदर थी। जब होमो सेपियन्स ने अन्य समस्त प्राणियों का प्रभुत्व समाप्त कर इस धरती पर अपना श्रेष्ठत्व कायम किया, तब न तो समाज था, न धर्म था, न भाषा थी और न ही गांव, देश, राष्ट्र और तमाम सामाजिक रिश्ते नाते थे। बौद्धिक क्रांति के बाद जब कृषि क्रांति हुई, उसके बाद ही समाज को संगठित करने, आपसी संघर्ष, विवाद और अनुशासन बनाये रखने के लिए समस्त प्रकार के नियम कानून, रीति-नीति, संस्कार, विविध संगठन इत्यादि की नींव पड़ी। सभ्यता का विकास हुआ। विज्ञान, कला, इतिहास, गायन-वादन, ज्योतिष्कविज्ञान इत्यादि विविध विधाओं में मनुष्य पारंगत होते गये। विविध प्रकार के समाज बने। देश का गठन हुआ। संप्रभुता, पूंजीवाद, साम्यवाद, समाजवाद, भोगवाद, त्यागवाद, ज्ञान मार्ग, भक्ति मार्ग इत्यादि की अवधारणाएं पनपने लगीं। उस समय इन सब चीजों की आवश्यकता भी थी। परंतु आज वैज्ञानिक क्रांति की बदौलत मानव सभ्यता लंबी छलांग लगा चुकी है। मनुष्य सिर्फ धरती में होने वाली घटनाओं को लेकर ही निश्चिंत नहीं हैं। हम चांद पर विजय प्राप्त कर चुके हैं। हम मंगल ग्रह पर अपना यान उतार चुके हैं। हमारे हाथ में एक से एक प्रकार का मोबाइल फोन है। इंटरनेट है। सेकेंडों में ही हम अपने ईष्ट-मित्रों से सम्पर्क करते हैं, परिवार से जुड़ जाते हैं। बात करते हैं। तस्वीर देखते हैं। बुलेट ट्रेन बन चुकी है। सुपर सोनिक हवाई जहाज हमें चंद घंटों में ही एक महादेश से दूसरे महादेश में पहुंचा देता है। पनडुब्बी है। हमारे पास परमाणु हथियार है, जो धरती को पल भर में भस्म करने में सक्षम है। गर्मी में हमारे पास वातानुकूलन की सुविधाएं हैं। कार में एसी है, कमरे में एसी है। सुख-सुविधाओं से संपन्न हो चुके हैं हम सब। हमारे पास क्या नहीं है? संपूर्ण विश्व एक छोटा सा गांव बन चुका है। इतना सब होने के बावजूद इस गांव में क्या हम लोग सुख चैन से रह पाते हैं? आप देखेंगे कि चारों तरफ मारकाट मची हुई है। हिंसा में निर्दोष लोगों की मृत्यु हो रही है। हम सब एक दूसरे के खून के प्यासे हो चुके हैं। किसी समय दुनिया में राजतंत्र पर धर्म का प्रभाव व्यापक था। पुरोहित, पादरी इत्यादि की सलाह लिये बिना राजा कोई काम नहीं करता था। आज भी वही सब हो रहा है। स्वरूप जरा सा बदल गया है। आज संत आसाराम, संत रामपाल की खबरें आ रही हैं। न जाने और कितने सारे बाबा होंगे।
भारत में खासकर हिन्दू धर्म में संतों की भरमार हो गयी है। इतने पंथ और इतने संत अन्य देशों में एवं अन्य धर्मों में हैं क्या? मैंने नहीं सुना है। धर्म के ये सारे ठेकेदार क्या चमत्कार करेंगे, भगवान ही जाने। इतिहास में इस बात का कहीं भी उल्लेख नहीं है कि नानकजी, तुकारामजी, संत ज्ञानेश्वरजी, कबीरदासजी, तुलसीदासजी, चैतन्यमहाप्रभु, मीराबाई, सूरदास, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, जैसे संत धन संपत्ति लेकर प्रवचन देते थे अथवा भजन करते थे। उस समय के संत और गुरु तड़क भड़क से दूर रहकर प्रभु का नाम लेते थे। शिवाजी के गुरु संत रामदास ने कभी भी राजमहल का सुख नहीं लिया। लेकिन आजकल संत प्रवचन करने, भजन करने के लिए भारी भरकम धन लेते हैं। उनका प्रवचन सुनने के लिए पहले से ही हजारों रुपये की फीस जमा करनी पड़ती है। वे पांच सितारा होटलों के एसी रूम में ठहरते हैं। दिव्य भोग लगाते हैं। महलों में निवास करते हैं। सुन्दरियां आगे पीछे घूमती रहती हैं। किसी भी गुरु को नहीं देखा जिनके साथ महिला शिष्या न हो। शायद अपवाद कुछ हो सकते हैं। ढोंगी संतों और गुरुओं के बहकावे में हैवान बनते जा रहे हैं। संस्कृत के कुछ श्लोक रटकर ऐरा गैरा नत्थू खैरा संत बनकर पैसा कमा रहे हैं। हमारे देश को कौन बचायेगा? किसी धर्म के संत लोगों को ठग रहे हैं, तो किसी अन्य धर्म के संत लोगों को हिंसा तथा नफरत की आग में झोंक रहे हैं....दुनिया भौतिक रूप से प्रगति कर रही है, परंतु हम हैं कि मानसिक रूप से पत्थर युग की तरफ लौट रहे हैं....। हम जंगली सभ्यता के पुरोधा बनते जा रहे हैं। यथार्थ में मानवता की बात, मानवसेवा, देश सेवा, समाज सेवा की बात कोई नहीं कर रहा है। किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना मेरा उद्देश्य नहीं है। हमें निष्पक्ष होकर वैश्विक मंगल और मानवता के हित में चिंतन करते हुए तदनुसार निर्णय लेना चाहिए।
हम आजकल जाति, धर्म, रंग, समुदाय में बंट चुके हैं। मेरा एक ही सवाल है, मेरे अथवा आपके अस्तित्व के लिए दो लोगों की सक्रिय भूमिका थी। अर्थात दो लोगों के सहयोग से मेरा या आपका जन्म हुआ। उन दो लोगों के जन्म के लिए चार लोग जिम्मेदार थे। उन चार लोगों के जन्म लोगों के लिए आठ लोगों की भूमिका थी। उन आठ के लिए सोलह, सोलह के लिए 32, 32 के लिए 64.....कृपया मात्र पचास पीढ़ी पीछे जाइये, और पता लगायें कि मेरे या आपके वर्तमान अस्तित्व के लिए कितने लोगों का नेपथ्य में योगदान रहा है। उसके बाद पड़ोसी, विधर्मी, परधर्मी या विदेशी का कत्ल करने के लिए क्या आप हथियार उठा सकेंगे?
सुभाष चन्द्र विश्वास
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