Tuesday, December 23, 2014
महज छह सौ रुपये के लिए आत्महत्या का प्रयास...
पिछले हफ्ते मेरे एक दोस्त ने फ्लिप कार्ट से एक जैकेट मंगाया था, जिसकी कीमत थी तीन हजार रुपये। ऐसी बात नहीं है कि उसके पास गर्म कपड़ों की कमी है। उसके पास सूट है, दो-दो पूरी बांह का स्वेटर तथा तीन-चार हाफ स्वेटर भी हैं। फिर भी उसने खर्च कर दिये तीन हजार रुपये। कुछ तो शौक पूरा करना था और कुछ लोगों को दिखाना भी था। खैर तीन हजार रुपये कोई बहुत बड़ी रकम नहीं है। हमारे देश में ऐसे हजारों लोग हैं जो करोड़ों रुपये की कार में चलते हैं। बुर्ज खलीफा में फ्लैट लिये हुए हैं। मुकेश अम्बानी का नाम तो हम सबने सुना है। दक्षिण मुम्बई में मुकेशजी का मकान लगभग 1 अरब अमरीकी डालर (लगभग 55 रुपये का एक डालर) से तैयार हुआ है। मकान के रखरखाव के लिए ही 600 कर्मचारी नियुक्त किये गये हैं। सोचिये 6 सौ कर्मचारियों का वेतन कितना हो सकता है। दुनिया का यह दूसरा सबसे महंगा आवासीय मकान है। हमारे देश के लगभग सभी बड़े शहरों में पांच सितारा होटल हैं। लाखों लोग इन होटलों में रुपये पानी की तरह बहाकर गर्व का अहसास करते हैं। एक एक फिल्म अभिनेता शाही अंदाज में जीवन बिताते हैं। एक एक अभिनेत्री की एक साड़ी की कीमत का अंदाजा हम लोग नहीं कर सकते हैं। एक एक नेता के पास इफरात में धन है। एक बार सांसद या विधायक बन जाने पर दो चार साल में ही करोड़ों अरबों रुपये की जायदाद के मालिक बन जाते हैं। इन सब बातों से यही साबित होता है कि हमारा देश गरीब नहीं है। हम लोग गरीब नहीं रह गये हैं। हम लोग कई मामलों में जैसे अंतरिक्ष अनुसंधान, मिसाइल का निर्माण तथा विकास, कला-संस्कृति तथा खाद्य उत्पादन में अन्य विकसित देशों का मुकाबला कर सकते हैं। कई लोग करते भी हैं।
आखिर मैं इतना सब कुछ क्यों कह रहा हूं? इतनी लंबी चौड़ी भूमिका बांधने की क्यों आवश्यकता आ पड़ी है?
वास्तव में आज ही एक समाचार पढ़ने को मिला। पश्चिम बंगाल के कांथी (कोंटई) शहर में एक छात्र ने कालेज की फीस के मात्र 2500 रुपये की व्यवस्था नहीं कर पाने की मजबूरी, लज्जा और दुख से आत्महत्या का प्रयास किया है। कांथी के देशप्राण कालेज के बंगला आनर्स का द्वितीय वर्ष का छात्र सौमेन गिरि धर्मदासबाड़ इलाके का एक गरीब छात्र है। वह ट्यूशन से अपनी पढाई का खर्च निकालता था। कोर्स फीस ढाई हजार रुपये थी। उसने बमुश्किल 1900 रुपये की व्यवस्था की थी। लेकिन शेष रुपये का इंतजाम वह नहीं कर सका। उसे लगा कि फीस नहीं देने से उसका पंजीकरण रद्द हो जायेगा। इसी आशंका से उसने कालेज परिसर में ही जहर खाकर आत्महत्या करने का प्रयास किया। खबरों के अनुसार उसे अस्पताल में भर्ती किया गया है और यह पोस्ट लिखने तक उसकी हालत खराब थी। अर्थात हम यह मान सकते हैं कि 6 सौ रुपये की मदद कहीं से मिल जाती तो सौमेन यह कदम नहीं उठाता। छह सौ रुपये क्या बहुत बड़ी रकम है? आजकल लगभग सभी छात्र-छात्राओं के पास हजारों रुपये के स्मार्ट फोन रहते हैं। कइयों के पास तो मैंने दो-दो, तीन-तीन मोबाइल भी देखे हैं। तो क्या कारण है कि सौमेन मात्र छह सौ रुपये के लिए मरने पर आमादा हो गया? दरअसल हमारे आपके पास मात्र छह सौ रुपये उसके लिए छह लाख से भी भारी थे। नहीं तो शौक से कोई मरता है क्या?
आठ मई 2013 की एक खबर है। मुजफ्फरनगर के अठाई गांव की एक दलित लड़की ने भी इसी तरह से आत्महत्या की कोशिश की थी, क्यों कि उसके माता-पिता उसके कालेज की फीस नहीं दे पाये थे। अनिता नाम की यह लड़की बीसीए की पढ़ाई कर रही थी। जब वह कालेज का फीस नहीं जमा कर सकी तो उसने नहर में छलांग लगाकर जान देने की कोशिश की। खैर लोगों ने उसे बचा लिया। सौमेन और अनिता के मामले में सबका साथ सबका विकास क्यों नहीं लागू हुआ। ऐसे और भी खबरें हैं, जो हमारी नजरों में पड़ती नहीं हैं या फिर हम उन पर नजर ही नहीं डालते हैं।
खासकर पश्चिम बंगाल में तथाकथित परिवर्तन ने क्या गुल खिलाया है? आमार सोनार बांगला, मां माटी मानुष ये सब नारे क्या हम लोगों को भ्रमित करने के लिए देते हैं? वोट बैंक के मद्देनजर लंबी चौड़ी हांकते हैं? इस राज्य में सारदा कांड जैसे करोड़ों अरबों रुपये के घोटाले की चर्चा चल रही है। राष्ट्र स्तर पर राष्ट्रमंडल खेलों में करोड़ों रुपये की हेराफेरी की पुष्टि हो चुकी है। टु जी घोटाला, कोयला आवंटन घोटाला....सैकड़ों घोटालों की खबरें रोज मिलती रहती हैं। अरबों-खरबों रुपये की लूट मची हुई है। हर राज्य में लगभग हर पार्टी का कोई न कोई नेता किसी न किसी घोटाला में फंसा हुआ है। भ्रष्टाचार और घोटाले की चर्चा करना शुरू कर दें तो एक पूरी किताब ही बन जायेगी।
जिस देश में अरबों का घोटाला होता है, लोगों को रुपये खर्च करने के लिए बहाने ढूंढने पड़ते हैं, जिस देश में लोग पान-बीड़ी-सिगरेट-गुटखा खाकर हर साल अरबों रुपये फूंक देते हैं, थूक देते हैं, उस देश में पढ़ाई का खर्च नहीं जुगाड़ कर पाने के लिए किसी को क्यों आत्महत्या के बारे में सोचना पड़ता है? हमारे संविधान में जीने का अधिकार है, शिक्षा का अधिकार है, चलने फिरने का अधिकार है। हमारी संसद में हमारे हितों की रक्षा करने के लिए हमारे प्रतिनिधि मौजूद हैं। फिर भी हम जी नहीं पाते हैं...या तो लाचारी में खुद मर जाते हैं या फिर कोई हमें मार देता है।
आमलासोल का नाम हम सब भूल गये होंगे। कोलकाता से महज 250 किलोमीटर दूर मिदनापुर जिले के आमलासोल में भुखमरी से कई लोगों के मरने की खबर से राज्य में हलचल मच गयी थी। कई सारे राजनीतिक नेता अचानक ही सक्रिय हो उठे थे। जलपाईगुड़ी के रायपुर चाय बगीचे में जून, 2014 में कम से कम छह लोगों की भुखमरी से मौत होने की खबर आयी थी। हालांकि राज्य सरकार ने इसका खंडन किया है। यह चाय बगीचा 2013 में बंद हो गया था और 645 कर्मचारी बेरोजगार हो चुके थे। कुछ पत्रकारों ने इस क्षेत्र का दौरा भी किया था तो उन्होंने कई लोगों को भूख से तड़पते हुए पाया था। जीत बहान मुण्डा नाम का एक व्यक्ति तो हड्डी का एक ढांचा बन चुका था। कई दिनों से उसे भोजन नहीं मिला था।
कितनी शर्मनाक बात है कि हमारे देश में अनाज एफसीआई के गोदामों में सड़ता रहता है और हमारे लोग भूख से मरते रहते हैं। इन बेसहारों के बारे में कौन सोचेगा? किसे हम इन अभागों की मौत के लिए जिम्मेदार ठहरायेंगे? सरकारी योजनाओं का लाभ इन लोगों तक क्यों नहीं पहुंच पाता है? शिक्षा का अधिकार अगर है तो फिर इन बच्चे-बच्चियों को आत्महत्या के लिए क्यों मजबूर होना पड़ता है। राष्ट्र, राज्य और समाज व्यवस्था की इस असफलता का क्या कारण है?
आज (अर्थात 23 दिसम्बर, 2014) निकले चुनाव परिणामों से तो हम खुश हैं कि भारतीय जनता पार्टी को झारखंड में सरकार बनाने का जनादेश मिल चुका है। जम्मू और कश्मीर में भी भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन किया है। चारों ओर खुशियां मनायी जा रही हैं। रात को खबर मिलती है कि असम में उग्रवादी हमलों में लगभग 40 लोगों की मौत हुई है। इसको लेकर भी राजनीति कुछ गरमा जायेगी। आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलेगा। कोलकाता में ईडी की हरकतों से एक खास पार्टी परेशान सी हो रही है। हम सब इन्हीं बातों में मस्त रहेंगे। सौमेन की खबर या तो छपेगी ही नहीं, छपेगी भी तो हम सब यूं ही नजरें डालकर अन्य तथाकथित महत्वपूर्ण खबरों पर चर्चा करने में व्यस्त हो जायेंगे। यही तो हमारा राष्ट्रीय चरित्र है।– सुभाष विश्वास
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