Friday, December 26, 2014

महिलाएं बनाम खाप पंचायतें और मनु

हाल ही राजस्थान के बाड़मेर से एक खबर आयी है। जिले के धोरीमन्ना थाना क्षेत्र के लुहारवा गांव में खाप पंचायत ने एक विवाहिता की नाक काटने तथा पीहर वालों का हुक्का पानी बंद करने का तालीबानी फरमान जारी किया है। पीड़ित महिला का अपराध इतना था कि उसने अपने ससुर के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज कराया था। इस आरोप में ससुर जेल गया लेकिन जमानत पर रिहा होने के बाद उसने समाज के ठेकेदारों से मिलकर खाप पंचायत बुलाई। इसके बाद पीड़ित महिला को बदचलन करार देते हुए उसकी नाक काटने तथा पीहर वालों का हुक्का पानी बंद करने का फरमान जारी करा दिया। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर की खाप पंचायत ने भी कुछ दिनों पहले एक विवादित फैसला सुनाया है जिसमें लड़कियों को व्हाट्सएप, फेसबुक, इंटरनेट, मोबाइल से दूर रहने और जींस नहीं पहनने का फरमान सुनाया है। मुजफ्फरनगर के शाहपुर थाना के शोरम गांव में 36 बिरादियों के खाप मुखि‍याओं ने पंचायत की। पंचायत के फरमान के तहत खाप मुखियाओं ने युवतियों के लिए व्हाट्सएप, फेसबुक, इंटरनेट, मोबाइल के इस्तेमाल और जींस पहनने पर रोक लगाने का फरमान सुना दिया। लड़कियों को इन सबसे दूर रहने की हिदायत दी गई है। खाप पंचायत ने कहा कि 18 साल के बाद लड़के या लड़की को मोबाइल दिया जाना चाहिए। इससे पहले वो फेसबुक देखते हैं, व्हाट्सएप देखते हैं, गंदी फिल्में देखते है। इसका गलत इस्‍तेमाल होता है। इसके पहले राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में मानवता को शर्मसार कर देने वाले एक मामले में 80 साल की एक वृद्धा को खाप पंचायत के आदेश पर निर्वस्त्र करने के बाद मुंह काला कर गधे पर घुमाया गया। जिले के करेड़ा तहसील के रायपुर थाना क्षैत्र में इस महिला की 30 बीघा जमीन हड़पने की नीयत से कुछ दबंगों ने उसे डायन करार दिया और कहा कि वह गांववालों के बच्चों को खा जाएगी। बाद में महिला को गधे पर बिठाकर गांव में घुमाया गया और रात भर यातनाएं देते हुए उसे पशुओं के बांधने की जगह पर खूंटे से बांध दिया गया। पीड़ित महिला ने बताया कि उसके पति की मौत करीब 37 वर्ष पहले हो गई थी और उसकी कोई औलाद नहीं है। इसके चलते कुछ गांव वाले उसकी 30 बीघा कीमती जमीन हड़पने की नीयत से आए दिन परेशान करते रहते थे। जब महिला ने इसका विरोध करना शुरू किया, तो लोग उसे डायन बताने लगे। यही नहीं, पंचायत ने भी महिला को गांव से बाहर निकाल देने की धमकी दी। पंचायत ने यह भी फैसला सुनाया कि अगर किसी ने महिला से बातचीत की, तो उसे एक लाख रुपये का जुर्माना भरना होगा। इसके बाद भी महिला ने गांव नहीं छोड़ा, तो कुछ दबंगों ने मुंह काला करके उसे निर्वस्त्र कर दिया और फिर गधे पर बिठाकर गांव में घुमाया। खाप या सर्वखाप एक सामाजिक प्रशासन की प्रणाली है जो उत्तर पश्चिम भारत जैसे हरियाणा, राजस्थान, पंजाब एवं उत्तर प्रदेश में प्राचीन काल से ही प्रचलित है। इसका मुख्य उद्देश्य समाज में सामाजिक व्यवस्थाओं को बनाये रखने के लिए मनमर्जी से काम करने वालों अथवा असामाजिक कार्य करने वालों को नियंत्रित करना है। उनका मानना है कि यदि ऐसा न हो तो स्थापित मान्यताएं, विश्वास, परम्पराएं और मर्यादाएं ख़त्म हो जायेंगी और जंगल राज स्थापित हो जायेगा। जाट समाज में यह न्याय व्यवस्था आज भी प्रचलन में है। इसी आधार पर बाद में ग्राम पंचायत का जन्म हुआ। खाप दो शब्दों से मिलकर बना है। ये शब्द हैं 'ख' और 'आप'। ख का अर्थ है आकाश और आप का अर्थ है जल। अर्थात ऐसा संगठन जो आकाश की तरह सर्वोपरि हो और पानी की तरह स्वच्छ, निर्मल और सब के लिए उपलब्ध अर्थात न्यायकारी हो। समय बदलता गया। कई कई क्रांतिकारी परिवर्तन हुए, परंतु खाप पंचायत अपनी सड़ीगली मान्यताओं को अभी भी ढोती जा रही हैं। हम दूसरे धर्म के लोगों को उलाहना देते हैं कि वे वर्षों पुराने धार्मिक कानूनों के मुताबिक चलते हैं, परंतु हम अपने भीतर कभी झांकने का दुस्साहस नहीं करते हैं। ये खाप पंचायतें सम्मान के लिए हत्या तक को भी जायज ठहराती हैं। कभी कहती हैं कि सगोत्र में शादियां नहीं होनी चाहिए। कभी फिर प्यार मोहब्बत करने वालों को कड़ी सजा देती हैं। एक से एक विवादास्पद और दकियानूसी फरमान जारी कर खाप पंचायतें हमेशा चर्चा में रहती हैं। हमारा कानून इनका कुछ नहीं कर सकता है। यहां तक सर्वोच्च न्यायालय ने भी इनके फैसलों को गलत बताया है, फिर भी इन पर अंकुश लगाने में सरकार असफल रही है। इन खाप पंचायतों का मुख्य निशाना महिलाएं ही होती हैं। इनकी नजरों में लड़कियां मां-बाप, गांव और खाप की निजी संपत्ति है। वैसे इनकी सोच में कोई गलती भी नहीं है। क्योंकि हमारे प्राचीन धार्मिक नेताओं ने भी महिलाओं को ऐसे ही प्रस्तुत किया है। उसी रूढ़िवादी विचारों का मात्र निर्वहन किया जा रहा है। संपूर्ण हिन्दू समाज में भी नारियों की स्थिति कुछ सुखद नहीं है। देवदासी प्रथा, नगरवधू प्रथा, सती प्रथा, परदा प्रथा इत्यादि इसके ज्वलंत उदाहरण है। इस प्रसंग में कुछ लोग शान से यह श्लोक सुनाते हैं- यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:। (जिस कुल में नारियों की पूजा, अर्थात सत्कार होता हैं, उस कुल में दिव्यगुण, दिव्य भोग और उत्तम संतान होते हैं और जिस कुल में स्त्रियों की पूजा नहीं होती, वहां उनकी सब क्रिया निष्फल हैं।) इसे सुनकर ऐसा लगता है कि हमारे भारतीय समाज, विशेष रूप से हिन्दू समाज में महिलाओं का बहुत मान सम्मान होता था। कई विद्वानों और गुणीजनों का प्रचण्ड दावा है कि प्राचीन काल में वैदिक समाज में महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त था। वे लोग गार्गी, मैत्रेयी और विद्याधरी का नाम लेते हैं। ऋग्र्वेद में ब्रम्हज्ञानी पुरुषों के साथ-साथ ब्रम्हवादिनी महिलाओं का भी नाम आता है। इनमें विश्ववारा, लोपामुद्रा, घोषा, इन्द्राणी, देवयानी आदि प्रमुख महिलाएं हैं। उन्हें श्रद्धा के साथ नमन करते हैं और निर्णय पर पहुंचते हैं कि मध्य युग के बाद और खासकर इस्लाम शासन के बाद से ही महिलाओं की स्थिति में गिरावट आयी है। चूंकि मैं प्राचीन काल का नहीं, बल्कि इस युग का हूं। मुझे प्राचीन काल में महिलाओं की दशा के बारे में इतना ही पता चला कि उपरोक्त दो चार नामों को छोड़कर कोई चमत्कारी महिलाओं का उल्लेख नहीं है। वर्तमान युग में सरोजिनी नायडू, विजय लक्ष्मी पंडित, प्रथम महिला प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी, किरण बेदी, मदर टेरेसा, अरुणा आसफ अली, आशापूर्णा देवी, उज्ज्वला पाटिल, रीता फारिया, बछेन्द्री पाल, संतोष यादव, चंदा कोचर, अरुन्धती भट्टाचार्य, महाश्वेता देवी, महादेवी वर्मा, सानिया मिर्जा, सायना नेहवाल जैसे सैकड़ों नाम मिल जायेंगे, जिन्होंने विविध क्षेत्रों में पूरी दुनिया में अपने को स्थापित किया है। इतने सारे नाम मिल जाने के बाद भी क्या हम दावे के साथ कह सकते हैं कि भारत में महिलाओं की स्थिति सुखद है? वे सम्मान और स्वतंत्रता के साथ जीवन जी रही हैं? जब वर्तमान युग में लोकतंत्र की स्थापना, संविधान में अधिकारों की रक्षा, पुलिस प्रशासन की चौकसी, संचार माध्यमों की प्रगति, शिक्षा का प्रसार, परिवहन की सुविधा, संवाद कायम करने के इतने सारे साधन होने के बावजूद महिलाओं की कुल मिलाकर स्थिति दयनीय ही है, तो हम किस आधार पर चार-पांच महिलाओं का नाम गिनाकर दावा करते हैं कि पुराने जमाने में महिलाओं को पुरुषों जैसा सम्मान मिलता था। मनुस्मृति में कहा गया है- स्वभाव एष नारीणां नराणामिहदूषणम . अतोर्थान्न प्रमाद्यन्ति, प्रमदासु विपश्चित: अविद्वामसमलं लोके,विद्वामसमापि वा पुनः प्रमदा द्युतपथं नेतुं काम क्रोध वाशानुगम मात्रस्वस्त्रदुहित्रा वा न विविक्तसनो भवेत् बलवान इन्द्रिय ग्रामो विध्दांसमपि कर्षति ! (अर्थात: पुरुषों को अपने जाल में फंसा लेना तो स्त्रियों का स्वभाव ही है! इसलिए समझदार लोग स्त्रियों के साथ होने पर चौकन्ने रहते हैं, क्योंकि पुरुषों के काम क्रोध के वश में हो जाने की स्वाभाविक दुर्बलता को भड़काकर स्त्रियां, मूर्ख ही नहीं, बल्कि विद्वान पुरुषों तक को विचलित कर देती हैं! पुरुष को अपनी माता, बहन तथा पुत्री के साथ भी एकांत में नहीं रहना चाहिए, क्योंकि इन्द्रियों का आकर्षण बहुत तीव्र होता है और विद्वान भी इससे नहीं बच पाते।) महिलाओं के प्रति मनु का विचार- नैता रूपं परीक्षन्ते नासां वयसि संस्थिति: सुरूपं व विरूपं वा,पुत्रनित्येव भुजन्ते पौंश्चल्याच्चलचित्ताच्च, नैस्नेह्याच्च स्वभावतः रक्षिता यत्नतोअपीह भर्तुष्वेता विकुवते एवं स्वभावं ज्ञात्वाअअसां प्रजापति निसर्गजम परमं यत्नमातिष्ठेत्पुरुषों रक्षणं प्रति श्य्यासनमलंकारं कामं क्रोधं अनार्जवम द्रोहभावं कुचर्या च स्त्रीभ्यो मनुरकल्पयत ! (अर्थात: पुरुषों में स्त्रियां न तो रूप का विचार करती हैं, न उसकी आयु की परवाह करती है! सुन्दर हो अथवा बदसूरत, जैसा भी पुरुष मिल जाये उसी के साथ भोग-रत हो जाती हैं। सदा पुरुष-संग की इच्छा रखने वाली ,चंचल-चित्त तथा स्वभाव से निष्ठुर होने के कारण, कितने भी यत्न से क्यों न रखी जाये, स्त्रियां पतियों के प्रति निष्ठावान नहीं रह जाती हैं। ये दुर्गुण स्त्रियों में सृष्टि के आदि काल से ही विद्यमान है, अत: पुरुष को बड़े यत्न से रक्षा करनी चाहिए। सृष्टिकर्ता ने नारी की रचना करते समय ही उसमे अपनी शय्या, आसन, आभूषण के प्रति मोह तथा काम, क्रोध ,बेईमानी ,द्वेष -भाव एवं चरित्रहीनता से दुर्गुण कूट-कूट कर भर दिये।) . मनु के विचार में महिलाओं को किसी भी हालत में स्वतंत्र नहीं होने देना चाहिए- अस्वतंत्रता: स्त्रियः कार्या: पुरुषै स्वैदिर्वानिशम विषयेषु च सज्जन्त्य: संस्थाप्यात्मनो वशे पिता रक्षति कौमारे भर्ता यौवने रक्षन्ति स्थाविरे पुत्र, न स्त्री स्वातान्त्रयमर्हति सूक्ष्मेभ्योपि प्रसंगेभ्यः स्त्रियों रक्ष्या विशेषत: द्द्योहिर कुलयो:शोक मावहेयुररक्षिता: इमं हि सर्ववर्णानां पश्यन्तो धर्ममुत्तमम यतन्ते भार्या भर्तारो दुर्बला अपि (अर्थात: पुरुषों को अपने घर की सभी महिलाओं को चौबीस घंटे नियन्त्रण में रखाना चाहिए और विषयासक्त स्त्रियों को तो विशेष रूप से वश में रखना चाहिए! बाल्य काल में स्त्रियों की रक्षा पिता करता है! यौवन काल में पति तथा वृद्धावस्था में पुत्र उसकी रक्षा करता है! इस प्रकार स्त्री कभी भी स्वतंत्रता की अधिकारिणी नहीं है! स्त्रियों के चाल ढाल में ज़रा भी विकार आने पर उसका निराकरण करना चाहिये! क्योंकि बिना परवाह किये स्वतंत्र छोड़ देने पर स्त्रियाँ दोनों कुलों (पति व पिता ) के लिए दुखदायी सिद्ध हो सकती हैं! सभी वर्णों के पुरुष इसे अपना परम धर्म समझते हैं! और दुर्बल से दुर्बल पति भी अपनी स्त्री की यत्नपूर्वक रक्षा करते हैं!) संक्षेप में इतना ही कहा जा सकता है कि खाप पंचायतें और कुछ हद तक बंगाल में सालिशी सभाएं (ग्रामीण न्याय बैठक) सिर्फ मनुवादी संस्कृति का ही अनुपालन कर रही है। खाप पंचायत के बारे में नेट खंगालने के दौरान एक किसी सिंह बंधु ने दावा किया है कि जाट ही एकमात्र शुद्ध नस्ल है। उसने यह भी दावा किया है करगिल की लड़ाई में जब सभी रेजिमेंट फेल हो गयी तो जाट रेजिमेंट को भेजा गया और उसने पाक फौज को शिकस्त दी। उसने यह भी सवाल उठाया कि चमार रेजिमेंट, नापित रेजिमेंट या चूड़ा रेजिमेंट का गठन क्यों नहीं किया गया है। हंसी आती है। कभी हिटलर ने भी दावा किया था कि जर्मन खून ही शुद्ध और सर्वश्रेष्ठ है। बहुत सारे हिन्दू विद्वान ऐसे विचारों की परवाह नहीं करते हैं, कहते हैं कि ये सनकी लोग हैं, इनकी बातों को छोड़ दें। ये विद्वान लम्बा चौड़ा दर्शन बघारेंगे, भाषण देंगे और जब अपनी बहू-बेटियों की बात आयेगी, जब अपने परिवार की बात आयेगी, तो कन्नी काट लेंगे, कहेंगे, भाई मजबूरी है- पिताजी, माताजी, पत्नी, भैया, चाचा, दादा-दादी, परिजनों सबका मान रखना ही होगा...। मैंने बहुत बड़े बड़े प्रतिष्ठित व्यक्तियों को देखा है जो अन्तर्जातीय विवाह का समर्थन तो करते हैं, परंतु अपने बेटे-बेटियों को सख्त हिदायत देते हैं- खबरदार, जाति के बाहर जाकर कुछ भी नहीं करना है। महान दार्शनिक, पर्यटक तथा लेखक राहुल सांकृत्यान की पुस्तक ``वोल्गा से गंगा तक’’ में उल्लेख है कि आदिम समाज मातृसत्तात्मक हुआ करता था। नारी दल या झुंड का नेतृत्व करती थी। उसके अधीन ही पुरुष रहते थे। (अभी भी कुछ आदिवासी समुदायों में यह प्रथा कायम है।) दल नेत्री मनचाहे पुरुष से शारीरिक संपर्क बनाती थी। दल में उसके कई पति हुआ करते थे, जैसे पुत्र स्वामी, पिता स्वामी, भ्राता स्वामी इत्यादि। लेकिन जब से पितृसत्तात्मक समाज की नींव पड़ी, लगभग समूचे विश्व में ही महिलाओं की स्थिति बिगड़ती चली गयी। कुछ लोग महिलाओं को आधी दुनिया मानते हैं, पर मेरे विचार से कुछ अपवादों को छोड़कर परतंत्रता ही महिलाओं की पूरी दुनिया है। - सुभाष चन्द्र विश्वास

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