Thursday, December 18, 2014

मैं भी हूं पेशावर के पाप का भागीदार

आज पाकिस्तान के पेशावर के सैन्य स्कूल में मासूम बच्चों के नृशंस हत्याकांड के बाद मुझे अपने आप से ही घृणा होने लगी है। मैं अब मनुष्य कहलाने योग्य नहीं रह गया। मेरे हाथ पर, पैरों पर, सीने पर, मुहं पर भले ही खून नहीं लगा हो परंतु मेरा मस्तिष्क, मेरी संवेदनाएं, मेरी अनुभूतियां तरोताजा लाल खून में डूब सी गयी हैं। उन बच्चों का क्या दोष था? उन बच्चों को क्यों आतंकवाद की बलि पर चढ़ाया गया? इसका उत्तर न केवल पाकिस्तान सरकार को, आतंकवादी संगठनों को या फिर धार्मिक उन्माद को, बल्कि मेरे देश को, मेरे देशवासियों को तथा पूरे विश्व के लोगों के साथ साथ मुझे भी देना होगा। मैं इस महान मानवता का हिस्सा हूं। इसके किसी भी अंश में कोई भी चोट पहुंचती है तो इसके लिए मैं स्वयं भी कहीं न कहीं दोषी हूं। हमारी सारी मानवता इसके लिए दोषी है। रूस के बेसलन स्कूल में भी वर्ष 2004 की पहली सितंबर को इसी तरह की एक घटना हुई थी। चेचेन उग्रवादियों ने 777 बच्चों समेत 1100 लोगों को बंधक बना लिया था। इसका दुखांत 186 बच्चों समेत कम से कम 385 लोगों की मृत्यु से हुआ था। क्या इसी दिन के लिए हजारों साल पहले हमारे पूर्वजों ने कंदमूल खाकर किसी तरह जीवन धारण करने की जन्मजात प्रवृत्ति छोड़ कर आग का आविष्कार किया था? खेती करने की शुरुआत की थी? भाषा का आविष्कार किया था? समाज और देश का गठन किया था? धर्मों की स्थापना की थी? किसलिए? हमारे पूर्वज तो चार पैरों से चलने वाले साधारण जानवर थे। उनके दांत सिंह या बाघ जैसे कठोर या तीक्ष्ण नहीं थे। उनके पंजों में नाखून इतने धारदार नहीं थे। उनमें हाथी जैसी शक्ति भी नहीं थी। फिर भी वे दुनिया में राज करने लगे। समस्त प्राणियों के भाग्यविधाता बन गये। दो पैरों से चलने वाले मानव के रूप में हमारा परिवर्तन क्या पेशावर में मासूम बच्चों का खून बहलाने के लिए हुआ था? क्या इसीलिए हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध इत्यादि धर्मों का गठन हुआ था? इतनी सारी उपासना पद्धति, पूजा पद्धति, इबादत की पद्धति आखिर किसा कारण से बनायी गयी? क्या इसीलिए मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा का निर्माण किया गया? इन मानव संतानों की रक्षा किसी ने भी नहीं की। मनुष्यों ने इनकी हत्या कर दी। न भगवान आगे आया और न ही खुदा आगे आया। प्रभु ईसा ने भी कुछ नहीं किया। मनुष्य बस हाथ मलते रह गये। यदि मान लें कि इन बच्चों की यही नियति थी, तो फिर नियति ही सब कुछ है क्या? पिछले जन्मों का कर्म फल? कुछ धर्मों में तो पुनर्जन्म की अवधारणा ही नहीं है। तो फिर? जब पिछला नहीं तो अगला क्या होगा? जीते जी कुछ नहीं मिला, मरने के बाद जन्नत मिलेगा? हो सकता है। टीवी पर देखकर, अखबारों में पढ़कर इतना ही कहेंगे...च्च्च बहुत बुरा हुआ। या फिर कुछ लोग यह भी कहेंगे कि पाकिस्तान ने जैसा बोया वैसा ही काट रहा है। विश्व के तमाम राष्ट्र नेता शोक व्यक्त कर रहे हैं। पाकिस्तान में तीन दिनों का राष्ट्रीय शोक मनाया जा रहा है। मैं भी थोड़ा बहुत दुख व्यक्त कर, कुछ अनाप-शनाप प्रतिक्रिया व्यक्त कर चुपचाप बैठा हूं। दो शब्द लिख कर मन का भंड़ास निकाल रहा हूं। क्या इतना ही हम सबका कर्तव्य है? क्या इसके आगे हम कुछ नहीं कर सकते हैं? कितने आश्चर्य की बात है कि दो साल पहले आज ही के दिन राजधानी दिल्ली में निर्भया कांड हुआ था। निर्भया कांड भी संपूर्ण मानवता के माथे पर कलंक है। हम पाकिस्तान की घटना पर तरह तरह की टिप्पणियां व्यक्त कर लेंगे, परंतु हमारे देश में निर्भया कांड के दोषियों को आज तक हम सजा नहीं दिला सके। हम तो महान लोकतंत्र के धारक हैं, हमारे पास कानून है, हमारे नेताओं के पास विवेक-बुद्धि-ज्ञान है। हमारा संविधान हमारी रक्षा करता है। पर हमारी मां बहनें सुरक्षित नहीं हैं। उनके साथ दुराचार होता रहता है, उनकी हत्या होती रहती है। कभी दहेज के लिए बलि चढ़ायी जाती है। प्रतिदिन बलात्कार, सामूहिक बलात्कार की खबरें मिलती रहती हैं। परंतु घोर आश्चर्य हमारा दमदार कानून काले काले कोट पहने कुछ लोगों के जेब में कैद हो जाता है। अपराधी मजे से सरकारी रोटियां तोड़ते रहते हैं। कुछ फिर मानवाधिकार संगठन हो हल्ला शुरू कर देते हैं। मानवाधिकार संगठनों का काम तो लगता है बस अपराधियों का ही साथ देना रह गया है। जब महान लोकतंत्र में ऐसी हालत है तो पाकिस्तान (जो कि जन्म से लेकर आज तक ज्यादातर समय सैन्य शासन या तानाशाही के अधीन रहा है) जैसे अलोकतांत्रिक या अर्द्धलोकतांत्रिक राष्ट्र से हम क्यों कुछ उम्मीद रखते हैं? कुछ पाकिस्तानी नेता तो यहां तक आरोप लगा रहे हैं कि पेशावर के सैनिक स्कूल में हमला करने वालों को भारत ने आर्थिक मदद दी थी। हंसी आती है। जहां आत्ममंथन की आवश्यकता है, वहां दोष मढ़े जा रहे हैं। जहां ठोस कदम उठाये जाने की आवश्यकता है, वहां बहाना ढूंढा जा रहा है। पाकिस्तान के नेता इमरान खान ने ठीक ही कहा है कि यह घटना किसी एक अंग या संगठन या व्यक्ति की असफलता नहीं है। यह हम सबकी (पाकिस्तानी कौम की) असफलता है। मैं इसमें इतना ही संयोजन करना चाहता हूं कि यह पूरे विश्व की असफलता है। यह संपूर्ण मानव समाज की असफलता है। हम निर्दोष बच्चों की रक्षा नहीं कर सकते हैं। हाय रे मानव! तू चांद पर जा रहा है, मंगल पर जा रहा है, पर तू अपनी संतानों की रक्षा नहीं कर पाता है। मैं भी कुछ नहीं कर पा रहा हूं। धिक मुझ पर भी है! दो चार पंक्तियां लिख कर समझ लूंगा कि मैंने अपना कर्तव्य कर लिया है। बच्चों की मासूम आत्मा को शांति मिले....उनके माता-पिता को परमपिता इस दुख को सहने की क्षमता प्रदान करें, क्या इतनी ही कामना कर सकता हूं! क्या यही मेरी सच्ची श्रद्धांजलि है! इसके आगे क्या मैं कुछ कर सकता हूं? इसी बेबसी के लिए मैं स्वयं को क्षमा नहीं कर पा रहा हूं। मुझे लगता है कि मैं भी आज के इस पाप के लिए समान रूप से जिम्मेदार हूं। मुझे भी सजा मिलनी चाहिए!! सुभाष चन्द्र विश्वास

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